Monday, December 2, 2013

बहुत याद आता है "बेहना " तुम्हारा मुझे "भाई" कहके बुलाना

dedicated to my sister lovee  today i try to joined some beautiful memories i have with my sister in my words  i hope  my blog kaash my words from saffron heart will definitely touch ur heart again .,,.,,.,.,.,






वो  मद्धम  सा  मुस्कुराना  और  वो  झूठ-मूठ  का  गुस्सा  दिखाना,
समझना  मेरी  हर  बात  को  और  मुझे  हर  बात  समझाना,
वो  लड़ना  तेरा  मुझसे  और  फिर  प्यार  जताना
बहुत  याद  आता  है  " लवी  तुम्हारा  मुझे  " भाई" कहके बुलाना,



वो  शाम  ढले  करना  बातें  मुझसे  और  अपनी  हर  बात  मुझे  बताना,
सुनके  मेरी  बेवकूफियां  तुम्हारा  ज़ोर  से  हंस  जाना,
मेरी  हर  गलती  पे  लगाना  डांट  और  फिर  मेरा  तुमको  मनाना ,
कोई  और  न  होगा  तुमसे  प्यारा  मुझे  यह  आज  मैंने  है  जाना,


वो  राखी  और  भाई-दूज  पे  तुम  से  सबसे  आखिर  मे  टीका  लग  वाना
कुमकुम  मैं  डूबी  ऊँगली  से  मेरा  माथा  सजाना, ओर्  हस्  कर  तुमसे  केह्ना  कि  टिका  छोटा लगाना
खिलाना  मुझे  मिठाई  प्यार  से  और  दिल  से  दुआ  दे  जाना,
बाँध के  धागा  कलाई  पे  मेरी  अपने  प्यार  को  जताना,


कभी  बन  जाना  माँ  मेरी  और  कभी  दोस्त  बन  जाना,
कभी  करना  होमेवोर्क्  मेरा  ओर्  छुपाना  फोन  मेरा
देना  नसीहतें  मुझे  और  हिदायतें  दोहराना,
जब  छाये  गम  का  अँधेरा  तोः  खुशी  की  किरण  बनके  आना,
हाँ  तुम्ही  से  तोः  सिखा  है  मैंने  गम  मैं  मुस्कुराना,


कहता  है  मन  मेरा  रहके  दूर  तुमसे  मुझे  अब  एक लम्हा  भी  नही  बिताना,
अब  बस "अन्श्  को  तोः  है  अपनी "बेहना  के  पास  है  जाना,
हैं  बहुत  से  एहसास  दिल  मैं  समाये  पता  नही  अब  इन्हे  कैसे  है  समझाना,
बस  जान  लो  इतना  "लवी "  बहुत  याद  आता  है  तुम्हारा  "भाई"  कहके  बुलाना

Monday, November 4, 2013

confessions of bound soul =-_dedicated to my all brothers



Confessions of a Bound Soul
















Brother, my brother, 
How selfish was I
While you seemed to struggle,
I sat idly by

Brother, my brother
Yes, try as I might
I now realize
It was also my fight

Brother, my brother
Now look at your arm
It's cold and immovable
Lost all its charm

Brother, my brother
Now look at your leg
There's so much left missing
Yet not once did you beg

Brother, my brother
Though I lost more in mass
It is you far more haunted
By our mistakes in the past

Brother, dear brother
Listen when I say
I will stick by your side
Until this goes away

Brother, dear brother
Listen when I say
I will stick by your side
Until our final day


Posted by Picasa

Wednesday, November 28, 2012

मे कभी इन्सान था

                        मे कभी इन्सान था 

 

 बस्ती में कोई  मर गया  है
चारों  तरफ शोर  गुल है
कोई अकेला ,खामोश टूटा हुआ ,
छाती में लिए ज़माने की ठोकरे
किसी अँधेरी कोठरी में रहा करता था !
तनहा -तनहा रोया करता था !
यहाँ से वहा ,वहा से यहाँ ,
उन तमाम उपहास ,उपेशा को झेल कर
कोठरी में चक्कर लगता ,
अपने  अस्तित्वा के नकार  की घुतन को
तरह तरह के तर्कों से ढका करता
अकसर खिड़की के किसी कोने से अपनी बेबसी को निहारता
कभी भुजते  हुए दिए की लपट से अपनी तुलना करता
सोचा करता सब ख़तम होता जा रहा है
अब किसी को उसकी जरुरत नही
हर गली हर दरवाजे खटकखटक कर
झुके कंधो का भोज लिए फिर लोट आया उस अंधेर नगरी में
जहा ख्जोया था वजूद उसका ,
अब गुमनामी में नाम था जिसका
थका हरा  वो ये जुंग भी हर गया
सब ने  पुछा  क्या नाम था उसका
बेबस होकर धरती बोली
मूर्खो ये तो बस ईमान था
अपनी रूह से पुचो की कब तू इन्सां था

Wednesday, June 6, 2012

बनना ही होगा मुझे बाल मजदूर















बाल मजदूर होटलो मे काम करते सडको पर गाडी धोते ...
 भीख माँगते, बोझ ढोते कचडा बीनते, 
कपडा बूनते गंदे मटमैले चीथडो मे कभी घृणा से, 
कभी करुणा से,
 देखा होगा तुमने मुझे अनजाने मे कुछ ने देनी चाही मुझे शिक्षा,

 कुछ ने आगे बढकर की मेरी रक्षा. बना दिए कानून मेरी हित मे लगा दी पाबंदी मेरे काम मे निस्वार्थ सहायता से अपनी बचाना चाहा मेरा बचपन. बाल शोषण के विरोध मे चलाई सशक्त लहर क्रांति की. 

देख प्रेम, छलकी आँखें आशा पा, अरमाँ जागे पर , प्रसन्नता के नभ पर छाए दुविधा के बादल एक जन के नाममात्र वेतन से मिलता नही भोजन एक वक्त का पिता के इन्ही दायित्त्वो को बाँटने का सपना अधूरा रह जाएगा. 
 है नही देह ढाँकने को वस्त्र है नही सिर छिपाने को छत गुजर रहा जीवन अभावो मे सड रहा तन तनावो मे पिता की कैसे मदद करुँ? 
 माँ की पीडा कैसे दूर कँरु? बहन को कैसे विदा कँरु? 
 भाई को कैसे सक्षम कँरु? है यही जीवन का लक्ष्य बनूँ परिवार का आधार करने अपने सपनो को साकार बनना ही होगा मुझे बाल मजदूर

असहाय सत्ता भिखारी




                                         असहाय    सत्ता   भिखारी




जब चौराहे पर कोई भिखारी भीख मांगता है उसके अलावा सब है अमीर यही बात जानता है

कोई बिना एक रूपए दिए निकल जाता है की उस एक रूपए से उसका क्या भला हुआ जाता है ...

जब बम धमाको में कोई विधवा अपना सिंदूर उजाडती है सिर्फ वो है अभागन यही बात मानती है
 कुछ कहते है सर्कार दुःख दर्द जानती है इसीलिए लाखों का मुआवजा बांटती है

 जब किसी अपराधी की सजा में २० साल लग जाते है पीड़ित तब भी कहता है हम संविधान मानते है
 उसके कई साल सिर्फ उम्मीद में में गुजर जाते है जहाँ से चले थे खुद को वहीँ खड़ा पाते है
 जब किसी बेरोजगार के तलवे घिस चुके होते है इस साल सरकार कुछ करेगी यही शब्द उसके मुख पर होते है

 दुनिया की झंझावतों से लड़ना सीख नहीं पाते है और एक दिन वो खुद को हम से बहुत दूर कर जाते है

 क्या हम इतने निरीह और असहाय हो गये है अभी जाग रहे है या सो गये है
 क्या अब हम अतीत से कुछ सीख रहे है या सत्ता बेगैरतों को देकर निश्चिन्त हो गये है
 सब कुछ होते हुए भी भिखारी का पेट नहीं भर सकते किसी को अनायास विधवा बनने से रोक नहीं सकते

 किसी सताए हुए की इन्साफ नहीं दिला सकते या किसी बेरोजगार की रोटी का इंतजाम नहीं कर सकते ये बात जो मुझे सालती है खुद से या शायद हम सब से यही जवाब मांगती है

ये भूक इन्सान कि













डाइनिंग टेबल पर खाना देखकर बच्चा भड़का फिर वही सब्जी,रोटी और दाल में तड़का....?
 मैंने कहा था न कि मैं पिज्जा खाऊंगा रोटी को बिलकुल हाथ नहीं लगाउंगा ...
 बच्चे ने थाली उठाई और बाहर गिराई.......? -------
 बाहर थे कुत्ता और आदमी दोनों रोटी की तरफ लपके .......?
 कुत्ता आदमी पर भोंका आदमी ने रोटी में खुद को झोंका और हाथों से दबाया कुत्ता कुछ भी नहीं समझ पाया

उसने भी रोटी के दूसरी तरफ मुहं लगाया दोनों भिड़े जानवरों की तरह लड़े एक तो था ही जानवर,
 दूसरा भी बन गया था जानवर.....
 आदमी ज़मीन पर गिरा, कुत्ता उसके ऊपर चढ़ा कुत्ता गुर्रा रहा था और अब आदमी कुत्ता है
या
 कुत्ता आदमी है कुछ भी नहीं समझ आ रहा था नीचे पड़े आदमी का हाथ लहराया,
हाथ में एक पत्थर आया कुत्ता कांय-कांय करता भागा........
आदमी अब जैसे नींद से जागा हुआ खड़ा और लड़खड़ाते कदमों से चल पड़ा.....
 वह कराह रहा था रह-रह कर हाथों से खून टपक रहा था बह-बह कर आदमी एक झोंपड़ी पर पहुंचा....... झोंपड़ी से एक बच्चा बाहर आया और ख़ुशी से चिल्लाया आ जाओ, सब आ जाओ बापू रोटी लाया,
 देखो बापू रोटी लाया, देखो बापू रोटी लाया.............

Monday, September 5, 2011

मे भी इन्सान हि हु


Kabhi uski zindagi kash par atki hai, 

 To kabhi Aasman tak bhi na simati hai.

 Kabhi khushi me kehta zindagi ke din char hain,

 To kabhi dukh me kehta waqt ke aage laachar hain.

 Kabhi bhid me bhi lagti usko tanhai hai, 

 To kabhi akele hokar bhi usne mehfil jamai hai.

 Kabhi roshni me bhi usko dar sa lagta hai, 

 To kabhi raat me bhi bekhauf phira karta hai

. Kabhi dhundhne se usko bhagwan bhi milta hai,

 To kabhi samne rakha mauja bhi aankho se fisalta hai.

 Kabhi khushi me bhi uski aankho me nami hai,

 To kabhi dard me bhi hansi ki nahi kami hai.
 Kabhi sitaron pe karta vishwas hai,

 To kabhi lakiron ko kehta bakwas hai.

 Kabhi har dard ko chupchap seh leta hai,

 To kabhi man ki har bat ko bebak keh deta hai.

 Kabhi zindagi parivar, mohabbat or yaari hai,

 To kabhi paisa in sab par bhari hai.

 Kabhi hindu to kabhi musalmaan hai,
 To kabhi insaaniyat hi uska deen-imaan hai.

 Kabhi har subah naya safar hai, o kabhi naa koi shaam na hi sahar hai. 

 Kabhi purani bataon ko yaad kar tasveeren nihar leta hai.
 To kabhi apne har ehsaas ko kagaz par utar deta hai 
 BUS YE INSAN HI TO HAI JO PATHAR KO BI KABHI BHAGWAN BANA DETA HAI

Monday, July 11, 2011

Monday, April 18, 2011

Kaash ,my words from safroon heart BY ANSH

                         कागज की संज्ञा

 

कोरा हु में अभी लेखन  का आभारी

भटका  हु में  कोई कश्ती बंजारी

अधूरे से है किसी लेखक के खवाब

प्रष्टो पे छिपे है किसी हस्ती  के जज्बात

विचारो के कमरे में होती है कोई बात

इस बरबस दुनिया को देख कर रूती है कागज की आँख

 

रंगों से सजी है खबरे हजार पर लेती है रिश्वत ये झोली उधार

शब्दों में भिखरी है किस्मत निखार पर पैसा  ही बोला हु में रद्दी बेकार

 

अभी कोरा हु में अभी लेखन का आभारी  पर भटका हु में ये कश्ती बंजारी !!!!
!!

                                         =अंश

Wednesday, January 12, 2011

ROOH KA BANJARA RE PARINDA

[Rooh ka banjara re parinda]







Is banjar basti ko basaaate banjaree]
Na koi gharonda(ghar) na koi chaaav
Chang/iktara hath me liye dr dr ghumte dhani/gao ........

Ye kahani hai 2 dosto ki.

{Safdar or madir banjare ki......}


05/01/97...............
[Haranchappda dhani]


Abhi suraj angdaiya lene hi wala tha
ki ek swar me maai ki awaj aati hai.
Uth mara beera
aa dekh safdar suraj ugi geeoo
mara beera tha bi aankhiya khol .
(Neend me safdar dheemi aawaj me)
mai sone dena.
They abaar mahne sova de...
Uth beera tanee bapu sang mela me koni jandoo ki...
Maai tu bapu ne rook me jaaun uke sang.
Me uui geo jo ui aaiyoo(me u gya or u aya)...
Bapu gussse me
kattrii ghadi lga di beera,ab chaal...
(maa jangle me se safdar ko neharti)
or ishare se bulati aale thare waste m thaki rotiya band di.bhuk lagi je to rotiya khava li jieeoo...
Safdr bapu ki ungli pakde reet ke khandar wali basti ki or chal diya jaha haranchapdaa kabile ke banjaro ki toli aai hui thi....
Safdr bapu ki ungli chod reet ke tiilo me ja kar baith gya.
Kuch antral bad(samay bad) uska dhyan ektara ki madhur awaj ne uska maan aakrshit kiya. Upr Khule aasman ki or dekhta to wo kbhi idhr udhr dekhta na jane in hawaaon ke sath ye awaaj kaha se aarhi thi.safdr prafulit maan se aawaj ki disha ki or bd chala ,ye awaj reet ke sabse bade tiile ke paas se arhi thi..
Safdr awaaj ki disha tak phuch jata hai  tiile pr chad kr dekhta hai ki uuut(camel) ki sirhane liye ek chota sa banjara baitha iktara bja rha hai. safdar bhagte hue tiile se pisal gya or reet ke pahaad me gula mati marte hue uuut se ja bhida.
Jb ankh khuli to dekha wo banjara safdr ko dekh kr jor jor se has rha tha.safdr ke pure kapdo me reet bhar gyi thi or uska muuh bhi reet ke bhut jaisa dikh rha tha,
safdr ko is hal me rota dekh banjara chup ho gya.or wo bhi reet ke pahad pr chad kr gula mati marta,idhr udhr kudta uuut se ja bhida.
Banjare ko aisa karte dekh safdr bhi jor jor se hasne laga.or dono reet ke pahad pr pura waqt khelte rahe kbhi wo uuut ki puch kichte to kbhi us pr savari krte to kbhi dono iktara bja kr haste nachte
madir sabse bade tiile pr chad kr aakash me udte panchiyo ko dekhta o kir safdar se kehta hai kaash mere bhi pankh hote
safdr ha fir hum dono door badlo ki ser karte ..,..,,.,, pr in nanhe parindo ke irade majboot they uuut pr chad kr aakash ko chune ki kosish krte
inhe aisa krte dekh mano badal bhi muskura uthe ho tbhi to bhuk ke mare madir or safdar ko badal jalebi or rasbari  najar aarhe they
Sham hone ko thi
Suraj ko dhalta dekh dono uuut pr baith khandar wali basti jaha safdr ke bapu or chote banjare ke kabile wale ruke they wahi chal padte hai
Safdr bapu ko dekh uuut se utr kr bapu ke paas chale jata hai.
Bapu gusse me.......................................hm
katttrii der se m thako intejar kr rha hu.
Kathe giuu cho?...ab chaal
bapu aage aage chal rhe they or yahan safdr miya
jate jate banjare se hath mila rha tha.

Bapu piche mud kr dekhte hai or jor se chilla kr awaj dete hai ab chaal beera
safdr hath chudate hue kehta hai hum kal milenge...................
Pr safdar ki rooti ka jhola wahi wo bhul jata hai.
Madir safdr ko hath se ishara krta hai or safdr bhi dhoor se use aisa krte dekh hath hila kr muskurata hai

safdr bapu ki or bhagte hue unke piche piche chal diya.







Safdr ki maai jangle se unke ane ki rah nihar rhi thi.
Safdr maai ko dekh unke paas doda .
aagio mara ladesar(folk word)
maai safdar ke kapdo ko niharti or muskra kr safdr ke sir pr apna hath feyrti...
safdr maai mane jor ki bhuk laagi hai,maai khavo ko kuch do na.
Abar tu muh hath dhole me thaki or thare bapu sa ki thali parosti hu....
Maai ke hath se khane ka pehla niwala khake
maai ko madir ke sath gujre din ki manghdank(apni kalpanik khani) khani sunata....
Or maai uski muskan se me hami bhar kr use khana khilati.
Khane khake safdr aangan me baithi maa ke hi aanchal me taro ko neharta so gya.
safdr ke
Sapne me wo or madir badlo ki ser karne nikalte.pantag ki trah asman ko chumte....

kismat ka khela

Jaha ek traf safdr apne sapno me khoya tha,.
Madir banjara safdar ke jhole ko apne gale se lagye iktara bjata or safdr ko yaad krta fir wo angidi(aaag) jalye apne maa bapu or kabile ke banjaro ke pass saman bandhe baith gya
banjare raat dhalne ka intejar kr rhe they
ye banjar basti jo in banjaro ne bsai thi wo firse suni hone wali .madir maan hi maan rota.

¤Banjaro ki kismat me ye kaisa khel hai zindgi ne khela
unka jeevan to sirf hai ek mela¤

or al subha wo sub banjare ek nyi dhani ki or chal diye.
Ek nayi zameen ko firse basti bnane
ek banjar tiilo ko bsane...

Pr yahan safdr ki subha adhure khawbo ki angdaiyo se hui...

Uske jehan me to ab tak wo iktara gunj rha tha.
Wo khandar basti ki or doda.
Pr rooh ka banjara ye parinda.
Ye gharonda/ye basti/galiya chod ke jaa chuka tha.safdar ka madir banjara dost uski yado ko in khandaro me akela chodke ja chla gya tha.
Wo roote hue aasman ,reet ke tiilo ko dekh kr chilla kr roote hue maan se kehta fir kyu sunaye tune ye geet malhaar ke.



Biti raat basi basi
padi hai sihane
bandh darwaja dekhe looti hai subha
thandi hai angidi sili
ab sili hai diware
gunje tak-rake inme
gunji koi dua

safdr ko khandar ke sirahne apna roti ka jhola dikhta hai
or usme madir ka iktara bhi tha jo wo safdr ke liye chod gya tha.
Safdr iktara liye apne ghar chala gya.


 fir
ek subha uski najar aakash me udti hui patang pr gayi  use laga ki uska madir banjara loot aaya hai wo iktara hath me liye bjate hue khandar ke pass chala jata hai
banjare ki toli is banjar basti me loot ayi thi.
pr safdr madir ko waha na dekh roo padta hai...............
fir uski najar khandar ki sirhane baithe madir or uske bapu pr padti hai........ madir ek hadse me apna ek hath gawa chuka tha.............safdar ko pass ate dekh madir use chune ki koshish me apna hath aage bdata hai madir ko aisa krte dekh safdar ke ankhe bhar ati hai ..............
madir > safdr dekh ab to ye aakaash bhi mujhse dur ho gya mere hath ab in tak kbhi na phuchenge
safdr uska hosla bdata or ghar se dori or patang lekr ataaaaa
patang bandh or likh diya us par madir banjare ka naam


dekh madir ab chu liya tune bhi ye aakash.............................................................................................................................................................